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	<title>खेती Archives - Udit Vani</title>
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	<description>पत्रकारिता में विश्वसनीयता के चार दशक</description>
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		<title>सरायकेला-खरसावां में नाबार्ड-टीएसएफ वादी परियोजना की प्रेरक सफलता</title>
		<link>https://uditvani.in/jharkhand/saraikela/saraikela-nabard-tsf-vadi-pariyojna-prerak-safalta/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Udit Vani]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Jun 2026 16:33:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सरायकेला]]></category>
		<category><![CDATA[आत्मनिर्भर भारत]]></category>
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		<category><![CDATA[झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[नाबार्ड-टीएसएफ वादी परियोजना]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>36 गांवों के 388 किसान परिवारों और 57 भूमिहीन आदिवासी परिवारों की बदली किस्मत</p>
<p>The post <a href="https://uditvani.in/jharkhand/saraikela/saraikela-nabard-tsf-vadi-pariyojna-prerak-safalta/">सरायकेला-खरसावां में नाबार्ड-टीएसएफ वादी परियोजना की प्रेरक सफलता</a> appeared first on <a href="https://uditvani.in">Udit Vani</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">उदित वाणी,&nbsp;जमशेदपुर :</strong> आज के दौर में जब ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात हो रही है, वहां नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन (टीएसएफ) ने संयुक्त&nbsp;&nbsp;परियोजना के जरिए एक शानदार मिसाल पेश की है. 30 मार्च 2016 से 31 मार्च 2025 तक चली इस परियोजना ने 36 गांवों के 388 किसान परिवारों और 57 भूमिहीन परिवारों की जिंदगी में हरियाली के साथ समृद्धि भी बो दी है.</p>
<p></p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">वादी मॉडल ने बदली तस्वीर</strong></p>
<p>परियोजना का मुख्य फोकस बागवानी आधारित खेती पर था. किसानों ने 25,838 आम (अम्रपाली, मल्लिका) और 9,783 अमरूद (एल-49) के पौधे लगाए. खेतों की मेड़ पर सागवान के पौधे लगाकर दीर्घकालिक आय का भी प्रबंध किया गया. आज इन बगीचों में लहराते पेड़ न सिर्फ फल दे रहे हैं, बल्कि किसानों के चेहरों पर मुस्कान भी बिखेर रहे हैं.</p>
<p></p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">भूमि और जल प्रबंधन</strong></p>
<p>भूमि और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम हुआ है. 379 जलकुंड, कृषि तालाब, गहरे बोरवेल, सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई और 100 एकड़ में माइक्रो ड्रिप सिंचाई प्रणाली ने पानी की कमी को दूर किया है. जल संचयन से भूजल स्तर बढ़ा और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मजबूत दीवार खड़ी हुई.</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">भूमिहीनों को भी दी आजीविका</strong></p>
<p>परियोजना ने भूमिहीन परिवारों को भी नहीं भुलाया. 35 परिवारों को बकरी पालन से जोड़ा गया, जहां प्रत्येक परिवार अब सालाना लगभग 60,000 कमा रहा है. इसके अलावा 20 परिवार मुर्गी पालन और 2 परिवार सूकर पालन से जुड़े. अंतरवर्ती खेती के जरिए टमाटर, पत्तागोभी, ब्रोकली, अरहर, सरसों जैसी फसलों ने अतिरिक्त आय के द्वार खोले.</p>
<p></p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">आय में हुई दोगुनी से ज्यादा बढ़ोतरी</strong></p>
<p>परियोजना के प्रभाव से आम का उत्पादन लगभग 5 लाख किलोग्राम पहुंच गया, जिससे करीब 1.5 करोड़ की आय हुई. अमरूद का उत्पादन भी 1 लाख किलोग्राम तक पहुंचा. सबसे प्रेरक बात यह है कि लाभार्थी परिवारों की औसत वार्षिक आय 50,000-60,000 से बढ़कर 1.3 लाख से 1.6 लाख हो गई. यानी हर परिवार की आय में 70,000 से एक लाख तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई.</p>
<p></p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">महिलाओं और समुदाय का सशक्तिकरण</strong></p>
<p>19 ग्रामीण बागवानी समितियां, 23 स्वयं सहायता समूह और जुलाई 2024 में गठित उआल-बाहा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी ने सामुदायिक ताकत को नई ऊंचाई दी. 500 से ज्यादा किसानों को प्रशिक्षण, एक्सपोजर विजिट और आधुनिक तकनीकों से जोड़ा गया.महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता में 90 फीसदी सुधार आया. मौसमी पलायन घटा, बच्चों की पढ़ाई बढ़ी, स्वास्थ्य और स्वच्छता में सुधार हुआ. सौर ऊर्जा और यंत्रीकरण ने महिलाओं के श्रमभार को भी कम किया.</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">चुनौतियों को पार कर स्थायित्व की मिसाल</strong></p>
<p>पशु चराई और आग जैसी चुनौतियों के बावजूद परियोजना ने मजबूत संस्थागत ढांचा खड़ा किया. एफपीसी के माध्यम से बेहतर विपणन, पैक हाउस, ग्रेडिंग और बाजार पहुंच ने बिचौलियों पर निर्भरता कम की.</p>
<p></p>
<p><strong style="color: rgb(153, 51, 255);">नाबार्ड-टीएसएफ वादी परियोजना</strong></p>
<p>यह परियोजना आज साबित कर रही है कि सही दिशा, सामुदायिक भागीदारी और आधुनिक तकनीक से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों का कायाकल्प संभव है. यह परियोजना न सिर्फ आय और उत्पादन बढ़ाने की मिसाल है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत और सतत विकास का जीवंत प्रतीक भी बन गई है. झारखंड के इन किसानों की कहानी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है जो सपना देखता है कि मेहनत और सही मार्गदर्शन से जंगल भी बगीचे बन सकते हैं और गरीबी भी समृद्धि में बदल सकती है.</p>
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