
उदित वाणी, घाटशिला : इस विधानसभा उपचुनाव में राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि जो दल अपने परंपरागत वोटों को बचाते हुये दूसरे दल के परंपरागत वोट में सेंघमारी करने में जितना सफल हो पायेगा उसकी जीत का परचम उतनी ही मजबूती से लहरायेगा. बताया जा रहा है कि भाजपा के प्रत्याशी बाबूलाल सोरेन के पिता चंपाई सोरेन ने परंपरागत आदिवासी मतों को अपना लक्ष्य बनाया और उसी के तहत चुनाव प्रचार भी किया. जबकि भाजपा के गैर आदिवासी नेता अपने परंपरागत सामान्य और पिछड़े समुदाय के मतदाताओं को एकजुट करने में जूटे रहे.
वंहीं दूसरी ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा के परंपरागत गैर आदिवासी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए लगातार काम किया . झामुमो के गैर आदिवासी विधायक और मंत्री निरंतर भाजपा के परंपरागत वोट में सेंधमारी के लिये काम करते रहे. शहरी वोटरों के बीच अपनी पैठ बनाने का ठोस प्रयास किया है जिसका परिणाम भाजपा के कई नेताओ का झामुमो का दामन थामने के रूप में दिखा. झामुमो ने अपने परपरागत वोटों को बचाये रखने के लिए भी जनजातीय समुदाय के मंत्री और विधायकों को बूथ स्तर तक पहुंचाया. अब यह देखना दिलचस्प होगा के कौन दल सेंधमारी में कितना सफल हो पाता है.

