
उदित वाणी, नई दिल्ली : हर वर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय विकलांगजन दिवस विश्वभर में दिव्यांगजनों के अधिकारों, समानता, सम्मान और उनकी सामाजिक भागीदारी को मजबूती देने का महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिवस उन चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिनका सामना शारीरिक, मानसिक या संज्ञानात्मक अक्षमता से जूझ रहे लोग रोज़मर्रा की जिंदगी में करते हैं—जैसे भेदभाव, अपमान, असमान अवसर और सामाजिक उपेक्षा।
संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष की थीम तय की है—
“सामाजिक प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए दिव्यांगजन-समावेशी समाज को बढ़ावा देना।”
यह थीम वर्ष 1995 के कोपेनहेगन सामाजिक विकास शिखर सम्मेलन में लिए गए उस वैश्विक संकल्प की पुनः पुष्टि करती है, जिसमें एक न्यायसंगत और समावेशी विश्व व्यवस्था स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी।
दिव्यांगजनों की वैश्विक स्थिति और चुनौतियाँ
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में 1.3 अरब लोग, यानी वैश्विक जनसंख्या का 16%, किसी न किसी रूप में दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। इसके बावजूद अधिकांश देशों के स्वास्थ्य बजट में दिव्यांगजनों के लिए आवश्यक सेवाएँ जैसे—व्हीलचेयर, ब्रेल उपकरण, कृत्रिम अंग, कॉक्लियर इम्प्लांट, साइन लैंग्वेज सेवाएँ—या तो शामिल नहीं हैं या बेहद सीमित हैं।
इसका परिणाम यह है कि लाखों परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है, और कई परिवार गरीबी की कगार पर पहुंच जाते हैं।
WHO ने चेतावनी दी है कि जब तक स्वास्थ्य बीमा और सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं में पहुंच, सामर्थ्य और समानता को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक “सबके लिए स्वास्थ्य” का लक्ष्य अधूरा रहेगा। संगठन ने सभी देशों से यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज योजना में दिव्यांगता-संबंधी सेवाओं को अनिवार्य रूप से शामिल करने की अपील की है।
इस दिवस का इतिहास और ‘दिव्यांग’ शब्द की अवधारणा
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1981 : संयुक्त राष्ट्र ने इसे अंतरराष्ट्रीय विकलांग वर्ष घोषित किया।
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1992 : हर वर्ष 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस मनाने का प्रस्ताव पास हुआ।
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2007 : नाम बदलकर International Day of Persons with Disabilities कर दिया गया।
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2015 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में ‘विकलांग’ शब्द की बजाय ‘दिव्यांग’ शब्द के प्रयोग का सुझाव दिया, ताकि सम्मानपूर्ण भाषा को बढ़ावा मिले।
यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि दिव्यांगजन देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास में समान भागीदारी के हकदार हैं। उन्हें अवसर, सहूलियत और सम्मान मिलना न केवल एक संवैधानिक कर्तव्य है, बल्कि मानवीय दायित्व भी।

