
उदित वाणी, जमशेदपुर : संधि पूजा दुर्गा पूजा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र अनुष्ठान है, जो नवरात्रि के दौरान अष्टमी और नवमी तिथि के बीच के समय—जिसे संधि काल कहा जाता है—में किया जाता है. इस बार यह मुहूर्त 30 सितंबर को शाम 07.36 से 08.24 बजे तक है जिसमें मां दुर्गा के चामुंडा रूप की पूजा होगी.
जलाए जाएंगे 108 दिये
संधि पूजा उस विशेष समय का प्रतीक है जब महाअष्टमी समाप्त होकर महानवमी आरंभ होती है. इसे करके देवी दुर्गा के उग्र स्वरूप ‘चामुंडा’ का आविर्भाव एवं असुर चंड और मुंड के वध की कथा का स्मरण किया जाता है. इस पूजा के दौरान मां दुर्गा के समक्ष 108 दीये जलाए जाते हैं, जो बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक हैं. माना जाता है कि संधि काल में की गई पूजा तुरंत फलदायी होती है और इस समय देवी की ऊर्जा अपने चरम पर होती है; इसलिए संधि पूजा के दौरान मां दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है. पूजा में देवी को 108 कमल के फूल, बिल्वपत्र, गुड़हल के फूल, पारंपरिक वस्त्र, आभूषण, कच्चे चावल, अनाज, और माला अर्पित की जाती है, साथ ही कद्दू और खीरे की बलि दी जाती है. संधि पूजा बुराई पर अच्छाई की जीत, शक्ति की प्राप्ति, और समस्त कल्याण हेतु की जाती है जिससे भक्तों को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं और देवी की कृपा सदैव बनी रहती है.
घंटी बजाकर होती है शुरूआत
संधि पूजा की शुरुआत घंटी बजाकर होती है, जिसमें मंत्रों का जाप और हवन किया जाता है. पूजा के अंत में माता की आरती की जाती है और प्रसाद वितरण होता है.
यह पूजा पश्चिम बंगाल सहित बंगाली समुदायों में अत्यंत श्रद्धा और भव्यता से मनाई जाती है, जो दुर्गा पूजा उत्सव का एक प्रमुख और भव्य हिस्सा है. संधि पूजा की अवधि लगभग 48 मिनट होती है, जिसे दो घटी कहा जाता है. यह पूजा नवरात्रि के अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के आरंभ के 24 मिनट के बीच होती है, क्योंकि यह समय दोनों तिथियों के बीच के संधि काल (मिलन काल) का होता है. संधि पूजा का समय वर्ष और स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, लेकिन इसे उसी शुभ मुहूर्त में किया जाता है जो चंद्र गमन के अनुसार तय होता है.
बलिदान / बली
परंपरागत रूप से कुछ स्थानों पर पशु बलि दी जाती है, अब अधिकतर स्थानों पर कद्दू या नारियल का प्रतीकात्मक बलिदान किया जाता है. पशु बलि का समय दुर्गा पूजा के महाअष्टमी और महानवमी के दिन होता है. परंपरागत रूप से बलि संधि पूजा पर दी जाती थी.
कुछ स्थानों पर यह बलि महानवमी की सुबह भी दी जाती है, देवी को प्रसन्न करने और विजय की कामना हेतु. मान्यता है कि महाअष्टमी और महानवमी पर माँ दुर्गा ने महिषासुर सहित कई राक्षसों का वध किया था. बलि का अर्थ केवल किसी जीव की हत्या नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी पशु प्रवृत्तियों – जैसे क्रोध, लोभ, वासना और अहंकार – का वध करना है. यानी बलि आत्म-नियंत्रण और शुद्धि का प्रतीक है. शक्ति पूजा की तंत्र परंपरा में रक्त या बलि को देवी की शक्ति को जाग्रत करने का माध्यम माना गया.
पशु बलि को प्रतीकात्मक रूप से असुरों के वध और बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में देखा जाता है. आजकल अधिकतर जगहों पर प्रतीकात्मक बलि (कद्दू, नारियल, ऊख) दी जाती है.

