
आंकड़ों ने खोली पोल, हर साल बढ़ रहा मौत का ग्राफ
हिट एंड रन मामलों में बढ़ी चिंता, पीड़ित परिवार बेहाल
उदित वाणी, जमशेदपुर : शहर की सड़कों पर तेज रफ्तार और लापरवाह ड्राइविंग अब एक गंभीर सामाजिक संकट का रूप ले चुकी है. तमाम जागरूकता अभियानों, ट्रैफिक पुलिस की सख्ती और नियम-कानूनों के बावजूद रेश ड्राइविंग (तेज व लापरवाह वाहन चलाना) पर लगाम नहीं लग पा रही है. नतीजा यह है कि हर साल सड़क दुर्घटनाओं और मौतों का आंकड़ा डराने लगा है. ताजा आंकड़े इस बात के साफ संकेत दे रहे हैं कि वर्ष 2025 में भी हालात सुधरने के बजाय और गंभीर होते जा रहे हैं.
बढ़ते हादसे, बढ़ती चिंता
सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े जमशेदपुर के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं हैं. वर्ष 2022 में जहां जिले में करीब 332 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गई थीं, वहीं वर्ष 2023 में यह संख्या मामूली रूप से घटकर 329 रही. हालांकि यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी और वर्ष 2024 में सड़क हादसों की संख्या फिर बढ़कर 348 तक पहुंच गई.
सबसे चिंताजनक स्थिति वर्ष 2025 की है. अभी वर्ष के केवल पांच महीने ही बीते हैं, लेकिन मई माह तक ही 273 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं. यदि यही रफ्तार बनी रही, तो साल के अंत तक हादसों का आंकड़ा पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है.
मौतों का बढ़ता आंकड़ा
दुर्घटनाओं के साथ-साथ मौतों का आंकड़ा भी लगातार चिंता बढ़ा रहा है. वर्ष 2022 में सड़क हादसों में 199 लोगों की मौत हुई थी. वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 218 हो गई. वर्ष 2024 में 236 लोगों ने सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाई. वहीं वर्ष 2025 में अब तक 176 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं.
आंकड़े साफ तौर पर यह इशारा कर रहे हैं कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष के अंत तक मौतों का आंकड़ा और भयावह रूप ले सकता है. हर आंकड़े के पीछे एक उजड़ा हुआ परिवार, टूटा हुआ सपना और अपूरणीय क्षति छिपी है.
रेश ड्राइविंग बना सबसे बड़ा कारण
यातायात पुलिस और प्रशासन के अनुसार, सड़क हादसों के पीछे सबसे बड़ी वजह रेश ड्राइविंग है. तेज गति से वाहन चलाना, ओवरटेक करने की होड़, ट्रैफिक सिग्नल की अनदेखी, हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनना, नशे की हालत में ड्राइविंग और मोबाइल फोन का इस्तेमाल – ये सभी कारण मिलकर हादसों को न्योता दे रहे हैं.
खासकर युवा वर्ग में रफ्तार दिखाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है. बाइक और कार को स्टेटस सिंबल समझकर लोग सड़कों को रेस ट्रैक में बदल रहे हैं. शहर के व्यस्त इलाके जैसे बिष्टुपुर, साकची, मानगो, कदमा और गोलमुरी में आए दिन तेज रफ्तार के मामले सामने आते हैं. रात के समय हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं, जब खाली सड़कों पर लोग बेखौफ होकर वाहन दौड़ाते हैं. इसका खामियाजा कई बार निर्दोष राहगीरों और नियमों का पालन करने वाले वाहन चालकों को भुगतना पड़ता है.
जागरूकता अभियान, पर असर सीमित
ट्रैफिक पुलिस द्वारा शहर में समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. नुक्कड़ नाटक, पंपलेट वितरण, हेलमेट और सीट बेल्ट के प्रति जागरूकता, तथा विशेष चेकिंग अभियान भी चलाए जाते हैं. इसके बावजूद हादसों में अपेक्षित कमी नहीं आ पा रही है.
यातायात पुलिस का कहना है कि नियमों का पालन सिर्फ चालान या सजा के डर से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की भावना से होना चाहिए. जब तक वाहन चालक खुद नियमों को अपनी और दूसरों की सुरक्षा से नहीं जोड़ेंगे, तब तक हालात में बदलाव मुश्किल है.
सख्ती के बावजूद नहीं सुधर रहे लोग
रेश ड्राइविंग और ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर पुलिस लगातार सख्ती बरत रही है. भारी जुर्माने, लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसी कार्रवाइयां की जा रही हैं. हिट एंड रन मामलों में भी पुलिस सख्त रुख अपना रही है. बावजूद इसके, नियम तोड़ने वालों की संख्या कम नहीं हो रही है.
हिट एंड रन के मामलों में स्थिति और भी चिंताजनक है. कई मामलों में आरोपी वाहन चालक दुर्घटना के बाद मौके से फरार हो जाते हैं, जिससे पीड़ित परिवार को न्याय मिलने में लंबा समय लग जाता है. आंकड़ों के अनुसार, ऐसे कई मामलों में अब तक केवल कुछ ही आरोपियों की गिरफ्तारी हो सकी है.
मुआवजे का प्रावधान, पर जान की भरपाई नहीं
सरकार ने सड़क हादसों के पीड़ितों के लिए मुआवजे का प्रावधान किया है. हिट एंड रन मामलों में मृतक के परिजनों को दो लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को 50 हजार रुपये दिए जाने का प्रावधान है. इसके अलावा सड़क दुर्घटना में मौत होने पर मुख्यमंत्री राहत कोष और विभिन्न बीमा योजनाओं के तहत भी सहायता दी जाती है.
हालांकि सवाल यही है कि क्या कोई भी मुआवजा किसी की जान की भरपाई कर सकता है? जिन परिवारों ने अपने कमाने वाले सदस्य को खो दिया, उनके लिए यह राशि केवल एक अस्थायी सहारा बनकर रह जाती है.
पुलिस और समाज की साझा जिम्मेदारी
यातायात विभाग के अधिकारियों का मानना है कि सड़क सुरक्षा केवल पुलिस या प्रशासन के भरोसे संभव नहीं है. इसके लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा. वाहन चालकों को यह समझना होगा कि हेलमेट, सीट बेल्ट, निर्धारित गति सीमा और ट्रैफिक सिग्नल का पालन कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का उपाय है.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यदि समय रहते रेश ड्राइविंग पर सख्ती नहीं की गई और लोगों की सोच नहीं बदली गई, तो आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं.
आम लोगों की चिंता
सड़क हादसों ने आम लोगों के मन में डर पैदा कर दिया है. कई परिवार ऐसे हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को सड़क दुर्घटनाओं में खो दिया है. उनका कहना है कि जब तक नियम तोड़ने वालों पर सख्त और त्वरित कार्रवाई नहीं होगी, तब तक लोग सबक नहीं लेंगे.
शहरवासियों की मांग है कि स्पीड कंट्रोल के लिए तकनीकी उपायों को और मजबूत किया जाए, सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाई जाए और हिट एंड रन मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाए.
चेतावनी दे रहे हैं आंकड़े
जमशेदपुर की सड़कों पर रफ्तार का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है. आंकड़े साफ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अब भी लोग नहीं संभले, तो हर साल सैकड़ों परिवार उजड़ते रहेंगे. जरूरत है जिम्मेदार ड्राइविंग, नियमों के प्रति सम्मान और सामूहिक जागरूकता की. तभी रेश ड्राइविंग पर लगाम लगाई जा सकती है और कीमती जानें बचाई जा सकती हैं.

