
उदित वाणी, जमशेदपुर : आदिवासी हो समाज दुःखू टोला, करनडीह के तत्वावधान में बुधवार को प्रकृति के पावन पर्व “बाहा पोरोब” का आयोजन अत्यंत हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ किया गया. फाल्गुन मास की इस बेला में जब प्रकृति नए स्वरूप में निखरती है, तब हो समाज के लोगों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करते हुए इस उत्सव को मनाया. कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ ग्रामीण दियूरी निरंजन हेंब्रम के द्वारा पारंपरिक पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चार के साथ किया गया, जिसमें समस्त ग्रामीणों ने शामिल होकर सुख-समृद्धि की कामना की.
इस विशेष अवसर पर उपस्थित युवा समाज सेवी श्री सागर हेंब्रम ने बाहा पर्व के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आदिवासी हो समाज में बाहा पर्व का गहरा प्राकृतिक आधार है. यह पर्व मुख्य रूप से ‘सारजोम’ (सखुआ) के पेड़ पर खिले फूलों को आधार मानकर मनाया जाता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह त्योहार न केवल हमारी परंपराओं का प्रतीक है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच के अटूट संबंध को भी दर्शाता है. जब तक सखुआ के फूल को देवता को अर्पित नहीं किया जाता, तब तक इस समाज में नए फूलों और फलों का उपयोग वर्जित माना जाता है, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज की संवेदनशीलता को दर्शाता है.
कार्यक्रम को भव्य और सफल बनाने में स्थानीय नेतृत्व और ग्रामीणों ने सक्रिय भूमिका निभाई. हातू मुंडा बबलू हेंब्रम के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में कान्हाई हेंब्रम, बबलू उगुरसनडी, पोगरो गागराई और गोमा गागराई ने विशेष सहयोग प्रदान किया. पूरे आयोजन के दौरान पारंपरिक गीतों और वाद्य यंत्रों की गूंज से दुःखू टोला का वातावरण भक्तिमय और आनंदमय बना रहा. अंत में समस्त ग्रामीणों के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन किया गया.

