उदित वाणी, रांची: भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक शहीद रघुनाथ महतो के 247वें शहादत दिवस पर शुक्रवार को झारखंड की राजधानी रांची के लवाडी चौक में राज्यपाल संतोष गंगवार ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की.
इस अवसर पर झारखंड ही नहीं, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम समेत पूर्वी भारत के विभिन्न हिस्सों में चुआड़ विद्रोह के इस महान योद्धा को पूरे जोश और सम्मान के साथ स्मरण किया गया.
चुआड़ विद्रोह: भारत का पहला सशस्त्र जन-आंदोलन
सन 1769 से 1778 तक चले इस विद्रोह का नेतृत्व रघुनाथ महतो ने किया था, जिसे इतिहास में चुआड़ विद्रोह के नाम से जाना जाता है. यह संघर्ष केवल ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध नहीं, बल्कि जन-स्वाभिमान और भूमि की रक्षा के लिए भी था.
दिल्ली के बादशाह शाह आलम द्वितीय ने 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, असम, बांग्लादेश तथा पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में राजस्व वसूली का अधिकार दे दिया था. कंपनी ने वर्धमान, पटना, मुर्शिदाबाद, दिनाजपुर, ढाका और कोलकाता में छह रेवेन्यू डिवीजन बनाए, जिनमें कोलकाता मुख्य केंद्र बना.
परमानेंट सेटलमेंट: रघुनाथ महतो की क्रांति से उपजा पहला भूमि कानून
इस जन-विद्रोह के दबाव में अंग्रेजी हुकूमत को 1793 में भारत का पहला राजस्व संबंधी लिखित कानून, परमानेंट सेटलमेंट, लागू करना पड़ा. यही वह ऐतिहासिक क्षण था जब कुड़मी समुदाय को ‘खुदकास्त रैयत’ घोषित किया गया और उनकी भूमि को अहस्तांतरणीय कर विशेष सुरक्षा प्रदान की गई. यह संरक्षण केवल कुड़मियों के लिए था – जो इस विद्रोह की व्यापकता और प्रभाव को दर्शाता है.
सरकारी मान्यता की दरकार
इतिहासकार और सामाजिक संगठनों का मानना है कि रघुनाथ महतो का योगदान भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव है.
चुआड़ विद्रोह केवल पहला ही नहीं, बल्कि देश के पहले संगठित जन-जागरण और क्षेत्रीय अधिकारों के लिए लड़े गए सबसे विशाल आंदोलनों में से एक था. इसलिए यह मांग लगातार उठ रही है कि झारखंड सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी 5 अप्रैल को शहीद रघुनाथ महतो की शहादत दिवस पर राजकीय अवकाश घोषित करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महानायक के बलिदान को जान सकें और उसका सम्मान कर सकें.
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