
उदित वाणी, नई दिल्ली/जमशेदपुर: राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर, भारत के प्रमुख सड़क अनुसंधान संस्थान CSIR-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) और दिग्गज स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील (AMNS) इंडिया के बीच एक ऐतिहासिक अनुसंधान और विकास (R&D) समझौता हुआ है. इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य सड़क निर्माण में ‘आयरन ओर टेलिंग्स’ (लौह अयस्क प्रसंस्करण का उप-उत्पाद) के बड़े पैमाने पर उपयोग की संभावनाओं को तलाशना है. यह तकनीक औद्योगिक कचरे को टिकाऊ बुनियादी ढांचे में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है.
तकनीक: आयरन ओर टेलिंग्स का मूल्यवर्धन
लौह अयस्क के शोधन (Beneficiation) के बाद बचने वाले बारीक कचरे को ‘टेलिंग्स’ या ‘स्लाइम्स’ कहा जाता है. वर्तमान में इन्हें बड़े बांधों में जमा करके रखा जाता है, जो पर्यावरण और प्रबंधन के लिहाज से एक बड़ी चुनौती है.
CSIR-CRRI के श्री सतीश पांडेय (स्टील स्लैग रोड तकनीक के आविष्कारक) के नेतृत्व में विकसित की जा रही इस तकनीक के तीन मुख्य चरण हैं:
सामग्री का लक्षण वर्णन (Material Characterization): टेलिंग्स के भौतिक और रासायनिक गुणों को समझने के लिए विस्तृत प्रयोगशाला जांच.
पेवमेंट डिज़ाइन एकीकरण: सड़क की ऐसी परतें तैयार करना जहाँ यह वेस्ट सामग्री मिट्टी और प्राकृतिक पत्थरों (Gravel) के वैज्ञानिक विकल्प के रूप में काम कर सके.
वैज्ञानिक पुष्टिकरण: फील्ड प्रदर्शन के जरिए यह सुनिश्चित करना कि ये ‘ग्रीन रोड्स’ भारी ट्रैफिक के दबाव और मजबूती के मानकों पर खरी उतरें.
प्रभाव: सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में एक मील का पत्थर
इस तकनीक के व्यापक पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ होने की संभावना है:
कचरे से कंचन (Waste to Wealth): भारत में हर साल लगभग 180-200 लाख टन आयरन ओर टेलिंग्स पैदा होती है. यह पहल इस विशाल कचरे के निपटान का एक व्यवस्थित रास्ता प्रदान करेगी.
प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: टेलिंग्स का उपयोग होने से पहाड़ों के खनन और नदियों से रेत निकालने की जरूरत कम हो जाएगी.
सस्टेनेबिलिटी: यह कदम हरित बुनियादी ढांचे के विकास (Green Infrastructure) के वैश्विक लक्ष्यों के अनुरूप है और सड़क परियोजनाओं के कार्बन फुटप्रिंट को कम करेगा.
लागत में कमी: स्थानीय स्तर पर उपलब्ध इस औद्योगिक वेस्ट के उपयोग से निर्माण सामग्री की लागत में काफी कमी आ सकती है.
झारखंड और कोल्हान क्षेत्र पर रणनीतिक प्रभाव
यह तकनीक झारखंड, विशेष रूप से कोल्हान प्रमंडल (पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां) के लिए परिवर्तनकारी साबित हो सकती है. भारत के लौह अयस्क खनन का केंद्र होने के कारण, कोल्हान को नोवामुंडी, गुआ और किरीबुरु जैसे क्षेत्रों में जमा कचरे के पहाड़ों के प्रबंधन का भारी दबाव झेलना पड़ता है.
झारखंड में इस मॉडल के सफल होने से दो समस्याएं एक साथ हल होंगी: पहला, स्थानीय परिदृश्य से खनन कचरे का बोझ कम होगा, और दूसरा, राज्य के बढ़ते सड़क नेटवर्क के लिए सस्ता व उच्च गुणवत्ता वाला कच्चा माल उपलब्ध होगा. जमशेदपुर जैसे औद्योगिक केंद्र के लिए, जहाँ भारी वाहनों के आवागमन के लिए मजबूत सड़कों की आवश्यकता होती है, यह तकनीक भविष्य की बुनियादी संरचना को और अधिक टिकाऊ और किफायती बना सकती है.

