
उदित वाणी, आदित्यपुर : आदित्यपुर स्थित आकाशवाणी परिसर से सटे खाली भूखंड पर कंटीले तार से घेराबंदी करने के लिए गाड़े गए पिलर को आदित्यपुर पुलिस ने उखाड़ दिया है और वहां चल रहे कार्य को रोकवा दिया है. यह कार्रवाई आकाशवाणी प्रशासन की लिखित शिकायत के बाद की गई है. थाना प्रभारी विनोद कुमार तिर्की ने बताया कि भूखंड पर दावा करने वाले राजीव कुमार को कागजात समेत थाना बुलाया गया है, जिसके आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी.
राजीव कुमार का दावा है कि यह भूखंड उनकी निजी संपत्ति है, जिसे उनके पिता ने 5 जुलाई 1982 को खरीदा था, जिसका डीड संख्या 2773/2794 है. कुल 15.5 डिसमिल भूखंड में से अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही 8.5 डिसमिल भूखंड पर अवैध रूप से पार्क का निर्माण कर दिया गया है, जबकि शेष 7 डिसमिल भूखंड को आकाशवाणी प्रबंधन अपने परिसर के रूप में उपयोग कर रहा है और वहां गैरेज का निर्माण भी कर लिया गया है.
राजीव कुमार ने बताया कि वे वर्षों से इस संपत्ति के लिए आयडा, आवास बोर्ड, अंचल कार्यालय और नगर निगम के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें न्याय नहीं मिला. उन्होंने कहा कि आदित्यपुर में वर्ष 1988 में आकाशवाणी ने इस भूखंड का अधिग्रहण किया था, परंतु उन्हें मुआवजा नहीं दिया गया. पिता के निधन के बाद पता चला कि जमीन पर गलत कब्जा हो रहा है, तब उन्होंने संबंधित विभागों के साथ पत्राचार शुरू किया. हालांकि आकाशवाणी प्रबंधन द्वारा जमीन से संबंधित दस्तावेज नहीं दिए जा रहे हैं और डीसी, डीसीएलआर से अनुरोध के बाद भी उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.
इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि जिस जमीन पर आकाशवाणी का गेट खोला गया है, वह भी नगर निगम से बिना नक्शा पास कराए खोला गया है. पूरे मामले को लेकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है और तब तक यथास्थिति बनाए रखने की मांग की है.
वहीं, शनिवार को आदित्यपुर नगर निगम के प्रशासक ने भी राजीव कुमार को नोटिस भेजा है. नोटिस में कहा गया है कि उन्होंने सरकारी भूखंड पर अवैध बाड़ लगाया है जो झारखंड नगर पालिका अधिनियम 2011 का उल्लंघन है. उन्हें 29 नवंबर को अपराह्न 12:30 बजे दस्तावेजों के साथ उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं. नोटिस में कार्रवाई के संभावित नियमों का भी उल्लेख है.
इस पूरे विवाद में जहां राजीव कुमार और आकाशवाणी दोनों ही भूखंड को अपनी संपत्ति बता रहे हैं, वहीं आदित्यपुर नगर निगम इसे सरकारी भूखंड मान रहा है. इस स्थिति में सही पक्ष का निर्धारण चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है.

