
कॉस्ट कन्ट्रोल के जरिए चुनौती से निबटने की कोशिश
उदित वाणी, जमशेदपुर : चीन से सस्ता स्टील भारत में डंपिंग के रूप में आ रहा है, जो टाटा स्टील जैसी प्रमुख कंपनियों के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है. 2024-25 वित्तीय वर्ष में भारत का स्टील आयात 9.5 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो पिछले 9 वर्षों में सर्वाधिक है. इसमें चीन का हिस्सा 31 प्रतिशत से अधिक है. इससे साफ है कि एक तिहाई स्टील केवल चीन से आ रहा है. टाटा स्टील के सीईओ टीवी नरेंद्रन ने चेतावनी दी है कि यह “अनुचित मूल्य” वाला आयात भारतीय स्टील उद्योग की निवेश योजनाओं को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि चीनी उत्पादक नुकसान उठाकर भी बेच रहे हैं. फिच रेटिंग्स ने मार्च 2025 में टाटा स्टील की रेटिंग हेडरूम को कम कर दिया, क्योंकि आयात से मार्जिन दबाव बढ़ा है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में टाटा स्टील का नेट डेब्ट-टू-इक्विटी रेशियो 0.9x से ऊपर चला गया और इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय ऑपरेशंस से राजस्व 5 फीसदी गिरा, मुख्यतः कम कीमतों और आयात प्रतिस्पर्धा के कारण. कुल मिलाकर यह चुनौती निवेश, लाभप्रदता और बाजार हिस्सेदारी को सीधे प्रभावित कर रही है, हालांकि घरेलू मांग बनी हुई है और यह 8-9 प्रतिशत वृद्धि (अनुमानित) है, जो टाटा स्टील के लिए राहत है.
सरकार की क्या हो सकती है भूमिका
भारतीय सरकार ने स्टील उद्योग की रक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाए हैं, जो टाटा स्टील जैसे उत्पादकों के लिए महत्वपूर्ण हैं. अप्रैल 2025 में 12 फीसदी अस्थायी सेफगार्ड ड्यूटी लगाई गई, जो मुख्य रूप से चीनी आयात पर लागू है, जिससे छोटी मिलों ने नौकरी कटौती टाल दी. इसके अलावा अन्य उपाय भी हो रहे हैं.
1. एंटी-डंपिंग ड्यूटी: जुलाई 2025 में स्टील वायर रॉड्स पर 5 वर्ष के लिए ड्यूटी लगाई गई. सितंबर 2025 में इलेक्ट्रिकल स्टील पर प्रस्तावित और अन्य उत्पादों (जैसे एलॉय स्टील) पर चल रही जांच पर लगाई गई.
2. बीआईएस मानक विस्तार: नवंबर 2024 से स्टील ग्रेड्स पर सख्त गुणवत्ता मानक लागू है, जो चीनी डंपिंग को रोकने में मदद कर रहे हैं.
3. निगरानी और नीतियां: स्टील मंत्रालय आयात की निगरानी बढ़ा रहा है और काउंटरवेलिंग ड्यूटी पर विचार कर रहा है, खासकर वियतनाम जैसे देशों के रूट से आने वाले चीनी स्टील पर. ये उपाय उद्योग की मांग पर आधारित हैं, जिसमें इंडियन स्टील एसोसिएशन (टाटा सहित) ने कस्टम ड्यूटी को 7.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की सिफारिश की है. सरकार का फोकस घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है, जो 205 मिलियन टन क्षमता तक पहुंच चुका है.
टाटा स्टील के भविष्य पर प्रभाव
यह चुनौती टाटा स्टील के भविष्य को मिश्रित रूप से प्रभावित करेगी, लेकिन सरकारी उपायों और वैश्विक रुझानों से सकारात्मक संभावनाएं हैं. आयात से अल्पकालिक तौर पर स्टील स्प्रेड्स गिरे हैं, जिससे प्रोफिट कम हुआ है. यूरोपीय ऑपरेशंस (27.5 प्रतिशत राजस्व) में ऊर्जा लागत और आयात से नुकसान बढ़ा है जबकि कैश रिजर्व वित्तीय वर्ष 22 से 45 प्रतिशत गिरे है. दीर्घकालिक तौर पर राजस्व में सालाना 6.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. 2030 तक उत्पादन क्षमता 40-50 मिलियन टन तक ले जाने की योजना है.
सकारात्मक कारक भी
टाटा स्टील के लिए कई सकारात्मक कारक भी है. मसलन यूरोपीय टैरिफ (चीन पर), चीन में उत्पादन कटौती और भारत में सेफगार्ड ड्यूटी से आयात कम हो सकता है. इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस में बदलाव से पर्यावरण अनुपालन मजबूत होगा. लेकिन एक जोखिम यह है कि अगर चीन की प्रॉपर्टी मांग नहीं बढ़ी या अमेरिकी टैरिफ से वैश्विक रीडायरेक्शन बढ़ा, तो दबाव बने रह सकता है.कुल मिलाकर, सरकारी समर्थन से टाटा स्टील की स्थिति मजबूत रहेगी, लेकिन निर्यात विविधीकरण और लागत नियंत्रण महत्वपूर्ण होंगे.

