समृद्धि के तमाम संसाधनों का त्याग कर अध्यात्म की दुनिया में चली गईं कुसुम बेन
उदित वाणी, जमशेदपुर: एक ऐसी दुनिया जहां जीवन की सारी सुख सुविधाएं मौजूद हों. आपके इशारे पर एक पूरी कायनात चलती हो और अचानक सब कुछ छोड़कर अध्यात्म की दुनिया में चले जाने का खुद ही फैसला ले लें तो आपके जाननेवाले चौंक जाते हैं.
शहर में कोका कोला और फंटा के बोटलिंग प्लांट का संचालन कर लाखों लोगों को इसकी मिठास पहुंचानेवाली कुसुम बेन कमानी का जीवन ऐसी महिलाओं के लिए उदाहरण पेश करता है जिन्हें अपने जीवन में किसी हादसे की वजह से बड़ी जिम्मेदारी निभाने का रिस्क उठाना पड़ता है और उसे अंजाम तक पहुंचाना होता है.
कुसुम बेन कमानी ने साबित किया है कि प्रतिकूल हालातों को अपने जज्बे से अनुकूल बनाया जा सकता है.
प्रतिकूल हालातों में संभाली बड़ी जिम्मेदारी
6 सितंबर, 1930 को राजकोट के प्रतिष्ठित वीरानी परिवार में जन्मी कुसुम बेन का विवाह धर्मचंद कमानी के साथ हुआ जो शहर में नरभेराम ग्रुप के संस्थापक नरभेराम कमानी के बेटे थे. 21 साल की उम्र में कुसुम बेन जमशेदपुर आ गईं.
उनके दो बेटे नकुल, किल्लोल और एक बेटी रूपा है. कुसुम बेन कमानी जब 39 साल की थीं तो 1969 में उनके पति धर्मचंद ने इस संसार से विदा ले ली. एक आम भारतीय महिला को ऐसी विपदा तोड़ देती है, लेकिन कुसुम नाम से भले ही फूल का बोध होता हो, वास्तव में कुसुम बेन जीवट की महिला थीं.
उनके ससुर नरभेराम कमानी ने उन्हें अपनी विशाल और दिव्य छत्रछाया में रखा.ऐसी विषम परिस्थिति में उनका व्यस्त कर देना ही एकमात्र उपाय था. उनकी काबिलियत के देखकर उनके ससुर ने उन्हें आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित स्टील सिटी बेवरेजेज के एमडी का उत्तरदायित्व सौंपा.
स्टील सिटी बेवरेजेज अमेरिका की मशहूर एमएनसी कोका कोला की फ्रेंचाइजी बनी और कोका कोला, फंटा की बॉटलिंग करती थी. बाद में इसी प्लांट में थम्स अप व दूसरे कोल्ड ड्रिंक्स की बॉटलिंग होने लगी थी. इस बॉटलिंग प्लांट से झारखंड के अलावा दूसरे राज्यों को भी कोल्ड ड्रिंक्स भेजे जाते थे.
वे एक तरफ प्रोफेशनल जिम्मेदारी अदा कर रही थीं तो दूसरी ओर तीन बच्चों को बड़ा करने की घरेलू जिम्मेदारी भी उनके सिर पर थी. लेकिन विचलित हुए बगैर उन्होंने दोनों मोर्चों पर अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन किया. प्रोफेशनल फील्ड में भी उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी.
यहां तक कि वे एक बार अपने बेटे नकुल के साथ कोका कोला के मुख्यालय अमेरिका में गई थीं तो कंपनी के मुखिया ने उन्हें नाम से पहचाना. एक भारतीय महिला के लिए उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी.
अपनी शर्तों पर जीवन जिया
बच्चों के लिए उन्होंने कोई कमी नहीं रखी. सबों को उत्तम शिक्षा उपलब्ध कराई. उन्हें जीवन में आगे बढऩे के गुर दिए. बेहतर मानवीय मूल्यों की शिक्षा दी. जैन धर्म के मौलिक आधारभूत तत्वों से परिचित कराया.
अकेले अपने कंधे पर सारी जिम्मेदारियों का बोझ उठाना उन्होंने महिला सशक्तीकरण का उस दौर में उदाहरण पेश किया जब सरकारों की डिक्शनरी में ये शब्द आया भी नहीं था. उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जिया.
इतनी सब जिम्मेदारियों को अकेले अपने ही कंधों पर उठाकर चली.स्वाभिमान से जीवन जिया.प्रामाणिकता-नीतिमत्ता और सिद्धांतों से उन्होंने कभी भी कमप्रोमाईज नहीं किय.सभी का पूरा सम्मान करती थी, राय लेती थी, विचार विमर्श जरूर करती थी, लेकिन अंतिम निर्णय अपने विवेक के अनुसार ही लेती थी.
सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता
सामाजिक क्षेत्र में वर्षों तक इसी व्यस्तता में से समय निकालकर सक्रिय रहीं.गुजराती भगिनि मंडल की संस्थापक अध्यक्ष रहीं और सब का साथ सबका विकास के सिद्धांत से शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और मानव सेवा के क्षेत्र में सर्वोन्मुखी रहीं.ये सब वो कर सकी उसके पीछे उनका टाईम मेनेजमेंट था.
अपने जीवन के अंतिम २० वर्ष उन्होंने धर्म और अध्यात्म को समर्पित किये. स्वयं की व्यक्तिगत उध्र्वगति के प्रयास में लगा दिए. वे अंतर्यात्रा की पथिक हो गई. इसलिए उन्होंने बाह्य प्रवृत्ति को पूर्ण विराम दिया.
कैवल्य की दशा को उपलब्ध करने की ओर बढ़ चली. शांत, मौन, और एकांत में उतर गई.इस प्रकार कुदरत की इच्छानुसार जो भी होता गया उसका ह्रदय से स्वीकार कर के उन्होंने १८ अगस्त, २०२२ गुरूवार को सुबह ९:२५ मिनट पर अंतिम श्वांस ली और परमात्मा के परम धाम में चली गई.
कुसुम बेन कमानी के लिए प्रार्थना सभा
कुसुम बेन कमानी के निधन पर आज शाम 4.30 से 5.30 बजे तक जुस्को स्कूल, कदमा में कुडी मोहंती ऑडिटोरियम में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया.
सभा में टाटा स्टील के एमडी टी वी नरेंद्रन समेत शहर के गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे. गुणवंत भाई पारीख ने कुसुम बेन के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन अनोखा एवं अभूतपूर्व था.
कुसुम बेन सिर्फ जमशेदपुर ही नहीं, बल्कि गुजराती एवं जैन समाज में पूरे देश के लिए आईकन थी. उनके बड़े पुत्र नकुल कमानी ने अपना अनुभव साझा किया.


